पोंगल: प्रकृति, संस्कृति और शास्त्रों का महा-संगम

भारतवर्ष त्योहारों और उत्सवों की भूमि है, जहाँ प्रत्येक पर्व के पीछे गहरा आध्यात्मिक, खगोलीय और वैज्ञानिक आधार छिपा होता है। दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु में मनाया जाने वाला‘पोंगल’ केवल एक फसल उत्सव नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की उस विचारधारा का प्रतीक है जो‘वसुधैव कुटुंबकम’ और प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने पर बल देती है। यह सनातन धर्म की उस परंपरा का जीवंत प्रमाण है जो “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और प्रकृति की पूजा” के सिद्धांत पर आधारित है। यह उत्सव सूर्य के उत्तरायण होने और नई फसल के आगमन का उल्लास है।

पोंगल का अर्थ होता है—“उबलना” या “प्रचुरता” 

‘पोंगल’ शब्द तमिल भाषा के ‘पोंगु’ धातु से निकला है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है— “उबलना” या “छलकना”। आध्यात्मिक दृष्टि से यह शब्द केवल दूध और चावल के उबलने का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन में सुख, समृद्धि, शांति और आध्यात्मिक आनंद के उफान का प्रतीक है।

1. शास्त्रीय एवं ज्योतिषीय आधार : 

पोंगल का समय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ‘मकर संक्रांति’ का होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस संक्रमण काल को संक्रांति कहा जाता है।

  • उत्तरायण का महत्व : श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 8, श्लोक 24) में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:
    “अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥” अर्थात, उत्तरायण के छह महीनों में ज्योतिर्मय मार्ग से शरीर त्यागने वाले ब्रह्मवेत्ता परम पद को प्राप्त होते हैं। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है, जो शुभता, प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है।
  • ऋण मुक्ति का पर्व : शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पोंगल के माध्यम से हम प्रकृति (देवताओं) और पशुधन के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर इन ऋणों से मुक्त होने का प्रयास करते हैं।

2. खगोलीय महत्व : 

पोंगल का पर्व खगोलीय गणनाओं  पर आधारित है। यह तमिल महीने ‘थाई’ की पहली तारीख को मनाया जाता  है, जो  सामान्यतः ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार १४  या १५  जनवरी को पड़ता है।

उत्तरायण की शुभ वेला : 

हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। इसी दिन से सूर्य ‘दक्षिणायन’ (दक्षिण की ओर गमन) से ‘उत्तरायण’ (उत्तर की ओर गमन) की यात्रा प्रारंभ करते हैं।

धार्मिक मान्यता : उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है। भीष्म पितामह ने स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी, क्योंकि इसे मोक्ष प्रदायक माना गया है।

वैज्ञानिक आधार : उत्तरायण के साथ ही दिन लंबे होने लगते हैं और शीत ऋतु की तीव्रता कम होने लगती है, जो कृषि और स्वास्थ्य दोनों के लिए अनुकूल है।

3. धार्मिक एवं पौराणिक संदर्भ : 

पोंगल का उल्लेख प्राचीन संगम साहित्य में भी मिलता है, जहाँ इसे ‘थाई निरादल’ के रूप में वर्णित किया गया है। धार्मिक दृष्टि से यह पर्व मुख्य रूप से ‘सूर्य देव’ को समर्पित है।

सूर्य पुराण और सूर्य देव की महत्ता : 

‘सूर्य पुराण’ के अनुसार, सूर्य ही इस जगत की आत्मा और साक्षात् नारायण (सूर्य नारायण) हैं। पोंगल पर सूर्य की पूजा इसलिए की जाती है क्योंकि वे ‘जगत के चक्षु’ हैं और उनके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। फसल का पकना और प्रकृति का फलना-फूलना सब सूर्य की ऊर्जा पर निर्भर है। अतः पहली फसल का भोग सूर्य देव को लगाकर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

  • अन्नं ब्रह्म : उपनिषदों में कहा गया है कि अन्न ही ब्रह्म है। जब किसान अपनी पहली फसल ईश्वर को अर्पित करता है, तो वह अहंकार का त्याग कर स्वीकार करता है कि यह सब ईश्वर की देन है।

4. चार दिवसीय उत्सव संरचना :  

पोंगल का उत्सव चार दिनों तक चलता है, जो ब्रह्मांड के विभिन्न तत्वों और शक्तियों को समर्पित है | 

प्रथम दिन: भोगी पोंगल (इंद्र देव को समर्पण)

यह दिन वर्षा के देवता ‘इंद्र’ को समर्पित है। किसान अच्छी फसल के लिए इंद्र देव का आभार व्यक्त करते हैं।

  • अध्यात्म : इस दिन ‘भोगी मंटालू’ (अलाव) जलाया जाता है, जिसमें पुरानी और बेकार वस्तुओं को आहुति दी जाती है। यह प्रतीकात्मक रूप से हमारे भीतर के विकारों, पुरानी ईर्ष्या और नकारात्मक विचारों को त्याग कर नए जीवन की शुरुआत का संदेश देता है।

द्वितीय दिन : सूर्य पोंगल (मुख्य पर्व)

यह पोंगल का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं, जिनके बिना सृष्टि की कल्पना असंभव है।

  • शास्त्रीय विधि : आँगन में मिट्टी के नए पात्र पर हल्दी का पौधा बांधा जाता है। उसमें नए चावल, दूध और गुड़ का मिश्रण पकाया जाता है। जब पात्र से दूध उबलकर बाहर गिरता है, तो परिवार के लोग “पोंगालो पोंगल!” का जयघोष करते हैं।
  • दर्शन : उबलता हुआ दूध इस बात का प्रतीक है कि हमारा जीवन सुख, शांति और समृद्धि से लबालब भरा रहे। यह भोग सबसे पहले सूर्य देव को अर्पित किया जाता है।

तृतीय दिन : मट्टू पोंगल (नंदी और गौ-वंश की पूजा)

यह दिन कृषि के आधार स्तंभ—बैल और गाय को समर्पित है।

  • पुराण संदर्भ: भगवान शिव ने अपने वाहन नंदी को पृथ्वी पर मनुष्यों की सहायता के लिए भेजा था। मट्टू पोंगल पर गायों के सींगों को रंगा जाता है और उन्हें माला पहनाई जाती है। यह ‘गौ सेवा’ के शास्त्रीय महत्व को दर्शाता है, जिसे शास्त्रों में सभी पुण्यों का मूल बताया गया है।

आईये इस दिन को पौराणिक कथा से भी जानते है –

भगवान शिव और नंदी की कथा: 

पोंगल के तीसरे दिन ‘माट्टू पोंगल’ के पीछे एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने अपने बैल नंदी को पृथ्वी पर जाकर मनुष्यों को संदेश देने को कहा कि वे प्रतिदिन तेल से स्नान करें और महीने में एक बार भोजन करें। लेकिन नंदी ने गलती से कह दिया कि रोज भोजन करें और महीने में एक बार स्नान करें। इस भूल के कारण शिव ने नंदी को पृथ्वी पर रहकर मनुष्यों की खेती में सहायता करने का आदेश दिया। यही कारण है कि पोंगल पर बैलों और मवेशियों की विशेष पूजा की जाती है।

चतुर्थ दिन : कानुम पोंगल (सामाजिक एकता) : 

‘कानुम’ का अर्थ है ‘देखना’ या ‘मिलना’। इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों और मित्रों से मिलते हैं। महिलाएं पक्षियों (विशेषकर कौओं) को भोजन कराती हैं, जिसे ‘काका पुडी’ कहा जाता है, ताकि परिवार में भाई-बहनों का प्रेम सदैव बना रहे।

5. पोंगल का पकवान: एक आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण :

पोंगल का विशेष भोजन केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी उत्तम है।

  • सामग्री: नए चावल, मूंग दाल, गुड़, घी, काली मिर्च और अदरक।
  • आयुर्वेद का संदर्भ: शीत ऋतु के अंत में शरीर की जठराग्नि को संतुलित करने के लिए गुड़ और घी का सेवन आवश्यक है। मूंग की दाल सुपाच्य होती है, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है। यह पकवान “सात्विक आहार” की श्रेणी में आता है, जो मन को शांत और शरीर को पुष्ट करता है।

परंपरागत रूप से, नए मिट्टी के बर्तन में नए कटे हुए चावल, दूध और गुड़ को उबालकर विशेष भोग तैयार किया जाता है। जब बर्तन से दूध उफन कर बाहर गिरता है, तो परिवार के सभी सदस्य हर्षोल्लास के साथ “पोंगल-ओ-पोंगल!” का उद्घोष करते हैं। यह उफान इस विश्वास को दर्शाता है कि आने वाला वर्ष धन-धान्य और खुशियों से इसी तरह लबालब भरा रहेगा।

6. सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व : 

पोंगल भारत की एकता का प्रतीक है। उत्तर भारत में जो मकर संक्रांति या लोहड़ी है, वही दक्षिण में पोंगल है।

  • रंगोली (कोलम): घर के द्वार पर चावल के आटे से बनाई गई रंगोली ‘कोलम’ केवल सजावट नहीं है। यह चींटियों और छोटे जीवों को भोजन देने का एक तरीका है, जो सनातन धर्म की “भूत यज्ञ” (प्राणियों के प्रति दया) की अवधारणा को पुष्ट करता है।
  • जल्लीकट्टू: मट्टू पोंगल के दिन वीरता का प्रदर्शन करने वाला खेल ‘जल्लीकट्टू’ आयोजित होता है, जो मनुष्य और पशु के बीच के अनूठे साहस और संबंध का प्रदर्शन है।

   पोंगल का आध्यात्मिक संदेश : कृतज्ञता ही पूजा है

आधुनिक युग में पोंगल हमें एक बहुत बड़ी शिक्षा देता है—कृतज्ञता । आज जब मानवता प्रकृति से दूर होती जा रही है, पोंगल हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व मिट्टी, जल, वायु और सूर्य के अधीन है।

सार-संक्षेप :

अतः पोंगल केवल फसलों का त्योहार नहीं, बल्कि यह परंपरा, विज्ञान और अध्यात्म का एक अद्भुत ताना-बना है। यह उत्सव हमें सिखाता है कि प्रगति का अर्थ प्रकृति का विनाश नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर चलना है। जब हम सूर्य की ऊर्जा, पशुओं की शक्ति और धरती की उर्वरता को नमन करते हैं, तो हम वास्तव में उस परमात्मा को नमन कर रहे होते हैं जो कण-कण में व्याप्त है।

इस पोंगल, आइए हम संकल्प लें कि हम न केवल अपनी फसलों और संपत्तियों की प्रचुरता मनाएंगे, बल्कि अपने विचारों में भी शुद्धता और हृदय में प्रेम का संचार करेंगे।

“थाई पिरंधाल वली पिरक्कुम”— यह एक प्रसिद्ध तमिल कहावत है, जिसका अर्थ है, “थाई महीने की शुरुआत के साथ ही नई राहें और अवसर खुलेंगे।” ईश्वर करें कि पोंगल का यह प्रकाश सबके जीवन में आरोग्यता और समृद्धि लेकर आए।

“पोंगालो पोंगल! भगवान सूर्य की कृपा आप पर सदैव बनी रहे।”

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