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शुक्ल प्रदोष व्रत (Shukla Pradosh Vrat) : भगवान शिव को प्रसन्न करने का महाव्रत

इस संसार में ऐसा कौन है जिसके जीवन में संकट नहीं हैं? किसी को स्वास्थ्य की चिंता है, तो कोई कर्ज़ से परेशान है। किसी को विवाह में देरी हो रही है, तो कोई मन की शांति ढूंढ रहा है।
इन सभी समस्याओं का समाधान केवल एक देव के पास है—देवाधिदेव महादेव। और महादेव को प्रसन्न करने का जो सबसे सरल, सबसे प्रभावशाली और शास्त्रों द्वारा प्रमाणित मार्ग है, वह है—प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat)।
हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर महीने की दोनों पक्षों (कृष्ण और शुक्ल) की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। लेकिन, शुक्ल पक्ष (Shukla Paksha) यानी चांदनी रात वाली त्रयोदशी को पड़ने वाले प्रदोष का अपना एक विशेष महत्व है। शुक्ल पक्ष ‘वृद्धि’ और ‘उजाले’ का प्रतीक है। इसलिए, जीवन में सकारात्मकता, धन और यश की वृद्धि के लिए शुक्ल प्रदोष व्रत को सर्वोत्तम माना गया है।
पुराणों में कहा गया है कि प्रदोष काल (सूर्यास्त का समय) वह समय है जब भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में कैलाश पर्वत पर तांडव नृत्य करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी स्तुति कर रहे होते हैं। इस समय की गई छोटी सी पूजा भी सीधे महादेव तक पहुंचती है।
‘द मंदिर दर्शन’ के इस विस्तृत लेख में, हम आपको शुक्ल प्रदोष व्रत की पूरी जानकारी, इसकी पौराणिक कथा, पूजा की सटीक विधि और दिन के अनुसार मिलने वाले फलों के बारे में बताएंगे।
प्रदोष काल क्या है?
प्रदोष व्रत की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप पूजा किस समय कर रहे हैं।
प्रदोष का अर्थ है—रात की शुरुआत।
सूर्यास्त (Sunset) से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद का जो समय होता है, उसे ‘प्रदोष काल’ कहते हैं।
यह दिन और रात के मिलन का समय है। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुला रहता है और वे अपने भक्तों की हर मनोकामना सुनने के लिए पृथ्वी पर भ्रमण करते हैं। इसलिए, प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा सुबह नहीं, बल्कि शाम को की जाती है।
शुक्ल प्रदोष व्रत का महत्व
स्कंद पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति 11 या 26 शुक्ल प्रदोष व्रत पूरी श्रद्धा से रखता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।
- चंद्रमा की मजबूती: शुक्ल पक्ष चंद्रमा के बलवान होने का समय है। जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर है या जो मानसिक तनाव (Depression) में रहते हैं, उनके लिए यह व्रत रामबाण है।
- पाप मुक्ति: यह व्रत अनजाने में किए गए पापों का नाश करता है।
- मनोकामना पूर्ति: विवाह, संतान और धन—इन तीनों इच्छाओं की पूर्ति के लिए शुक्ल प्रदोष अमोघ है।
वार (दिन) के अनुसार प्रदोष का फल
शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी किस दिन (Day of the week) पड़ रही है, इससे व्रत का फल और महत्व बदल जाता है। जानिए किस प्रदोष का क्या फल है:
- रवि प्रदोष (रविवार): स्वास्थ्य, आयु और मान-सम्मान के लिए।
- सोम प्रदोष (सोमवार): मन की शांति और मनोकामना पूर्ति के लिए (सबसे शुभ)।
- भौम प्रदोष (मंगलवार): कर्ज मुक्ति और बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए।
- बुध प्रदोष (बुधवार): बच्चों की बुद्धि और परीक्षा में सफलता के लिए।
- गुरु प्रदोष (गुरुवार): शत्रुओं पर विजय और सफलता के लिए।
- शुक्र प्रदोष (शुक्रवार): सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और धन के लिए।
- शनि प्रदोष (शनिवार): संतान प्राप्ति और खोया हुआ पद वापस पाने के लिए।
शुक्ल प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा
प्रदोष व्रत की कथा सुने बिना व्रत अधूरा माना जाता है। शुक्ल प्रदोष से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा एक विधवा ब्राह्मणी और एक राजकुमार की है।
कथा:
प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी थी जो अपने छोटे बेटे के साथ भिक्षा मांगकर अपना जीवन चलाती थी। वह बहुत धर्मपरायण थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी, तो उसे नदी किनारे एक बेहद सुंदर बालक मिला। वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था। पड़ोसी राजा ने उसके पिता को मार दिया था और उसका राज्य छीन लिया था। वह बालक अनाथ होकर भटक रहा था।
दयालु ब्राह्मणी उस राजकुमार को अपने घर ले आई और अपने सगे बेटे की तरह उसका पालन-पोषण करने लगी। वे दोनों गरीबी में दिन काट रहे थे।
एक दिन उनकी भेंट शांडिल्य ऋषि से हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उसके पास है, वह एक राजकुमार है जिसके पिता मारे जा चुके हैं। ऋषि ने उन तीनों (ब्राह्मणी और दोनों बालकों) को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि भगवान शंकर की कृपा से ही इनके दुख दूर होंगे।
ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने ऋषि की आज्ञा मानकर विधि-विधान से प्रदोष व्रत करना शुरू किया।
कुछ समय बाद, गंधर्व राज की कन्या ‘अंशुमती’ ने उस राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। भगवान शिव की कृपा से उन दोनों का विवाह हो गया। गंधर्व राज की सेना की मदद से राजकुमार ने अपने शत्रु राजा पर आक्रमण किया और अपना खोया हुआ राज्य वापस जीत लिया।
राजकुमार ने ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री बनाया और ब्राह्मणी को राजमाता का सम्मान दिया।
जिस तरह प्रदोष व्रत के प्रभाव से उस राजकुमार और ब्राह्मणी के दरिद्र जीवन में खुशहाली आई, उसी तरह जो भी भक्त शुक्ल प्रदोष का व्रत रखता है, महादेव उसके सारे कष्ट हर लेते हैं।
प्रदोष व्रत की पूजा विधि
प्रदोष व्रत में ‘पवित्रता’ और ‘समय’ का बहुत ध्यान रखना पड़ता है।
सुबह की विधि:
- सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करें।
- स्वच्छ (धुले हुए) वस्त्र पहनें। सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है (काले रंग से बचें)।
- घर के मंदिर में दीपक जलाएं और हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें: “हे महादेव! मैं (अपना नाम) आज आपकी प्रसन्नता के लिए शुक्ल प्रदोष का व्रत रख रहा हूँ। मेरी पूजा स्वीकार करें।”
- पूरा दिन मन ही मन ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते रहें। दिन में आहार न लें (फलाहार ले सकते हैं)। दूसरों की बुराई या क्रोध से बचें।
शाम (प्रदोष काल) की पूजा – सबसे महत्वपूर्ण:
- सूर्यास्त से एक घंटा पहले दोबारा स्नान करें। यही प्रदोष व्रत का मुख्य नियम है।
- अब शिव मंदिर जाएं या घर पर ही मिट्टी के शिवलिंग बनाएं।
- अभिषेक: शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें। फिर शुद्ध जल चढ़ाएं।
- शृंगार: महादेव को सफेद चंदन, भस्म (Vibhuti), अक्षत (चावल), और जनेऊ अर्पित करें।
- बिल्व पत्र: भगवान शिव को बिल्व पत्र (Belpatra) सबसे प्रिय हैं। 11 या 21 बिल्व पत्र पर चंदन से ‘राम’ या ‘ॐ’ लिखकर चढ़ाएं।
- धूप-दीप: गाय के घी का दीपक जलाएं और धूप दिखाएं।
- कथा और आरती: प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें और अंत में शिव जी की आरती करें।
क्या खाएं और क्या न खाएं?
व्रत का मतलब केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि शरीर को शुद्ध करना है।
- निर्जला: कुछ साधक बिना पानी के व्रत रखते हैं, जो सबसे उत्तम है।
- फलाहार: यदि निर्जला संभव नहीं, तो आप दूध, फल, साबूदाना, या कुट्टू का सेवन कर सकते हैं।
- नमक: प्रदोष व्रत में नमक (Salt) का सेवन वर्जित माना जाता है। यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे, तो सेंधा नमक का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन कोशिश करें कि मीठा फलाहार ही करें।
- अन्न: चावल, गेहूं, दाल आदि का सेवन बिल्कुल न करें।
प्रदोष व्रत में बरतें ये सावधानियां
- शिवलिंग की परिक्रमा: शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा (Full Circumambulation) नहीं की जाती। जलधारी (जहाँ से पानी बहता है) को लांघना घोर पाप माना जाता है। इसलिए हमेशा आधी परिक्रमा करके वापस लौट आएं।
- तुलसी: शिव पूजा में तुलसी का प्रयोग भूलकर भी न करें।
- हल्दी-कुमकुम: शिवलिंग पर हल्दी और कुमकुम नहीं चढ़ाया जाता (यह माता पार्वती को चढ़ता है)। शिवलिंग पर केवल चंदन और भस्म चढ़ाएं।
- केतकी का फूल: भगवान शिव को केतकी का फूल चढ़ाना मना है।
व्रत का उद्यापन
शास्त्रों के अनुसार, कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक उसका उद्यापन न किया जाए।
साधक को कम से कम 11 या 26 प्रदोष व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प पूरा होने के बाद त्रयोदशी तिथि पर ही उद्यापन करें।
- उद्यापन में हवन कराएं।
- ‘ॐ उमा महेश्वराय नमः’ मंत्र का जाप करें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें।
निष्कर्ष
शुक्ल प्रदोष व्रत केवल एक नियम नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन है।
जब सूरज ढल रहा होता है और दुनिया अंधेरे की ओर जा रही होती है, तब एक शिव भक्त दीपक जलाकर कहता है—“हे महादेव! आप ही मेरा उजाला हैं।”
अगर आप जीवन में हार मान चुके हैं, डॉक्टर और वकील से थक चुके हैं, तो एक बार विश्वास करके प्रदोष का व्रत शुरू करें। भस्म रमाने वाले भोलेनाथ बहुत दयालु हैं, वे आपकी खाली झोली जरूर भरेंगे।
अगले प्रदोष पर मंदिर जाएं और एक लोटा जल चढ़ाकर कहें—हर हर महादेव!