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सत्यनारायण व्रत कथा गीता प्रेस pdf download
श्री सत्यनारायण व्रत कथा (गीता प्रेस, गोरखपुर)
आवाहन
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।
अस्य श्री सत्यनारायण व्रत कथामन्त्रस्य, श्रीवशिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, श्री सत्यनारायणो देवता, विनियोगः – सर्वाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः।
ॐ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात्॥
प्रथम अध्याय: श्री सत्यनारायण व्रत कथा का महत्व
सूतजी बोले – हे ऋषियों! एक समय नैमिषारण्य में शौनकादि अठासी हज़ार ऋषि यज्ञ कर रहे थे। उन्होंने सूतजी से पूछा – हे सूतजी! इस कलियुग में पापों से भरे मनुष्य किस व्रत के प्रभाव से सभी दुःखों से मुक्त हो सकते हैं और सभी सुखों को प्राप्त कर सकते हैं?
सूतजी ने कहा – हे ऋषियों! पूर्वकाल में इसी प्रकार का प्रश्न व्यासपुत्र श्री सूतजी ने नारदजी से पूछा था। नारदजी ने कहा – हे सूत! मैं तुम्हें एक ऐसा पुण्यमय व्रत बताता हूँ जो मनुष्य को सभी दुःखों से मुक्त करता है। यह है श्री सत्यनारायण व्रत।
इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य धन-धान्य, पुत्र-पौत्र, आरोग्य और मोक्ष को प्राप्त करता है। यह व्रत अत्यन्त सरल और सभी के लिए करने योग्य है। अब मैं तुम्हें इस व्रत की पवित्र कथा सुनाता हूँ।
द्वितीय अध्याय: एक गरीब ब्राह्मण की कथा
एक बार नारदजी भगवान विष्णु के पास गए और पूछा – प्रभु! ऐसा कौन सा व्रत है जो कलियुग में मनुष्यों का कल्याण करे?
भगवान विष्णु ने कहा – हे नारद! श्री सत्यनारायण व्रत सबसे उत्तम है। इसका प्रभाव सुनो। एक बार धरती पर एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह भूख से व्याकुल भटक रहा था। भगवान विष्णु एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश बनाकर उसके पास आए और बोले – हे ब्राह्मण! तुम इतने दुःखी क्यों हो?
ब्राह्मण बोला – मैं बहुत गरीब हूँ, भिक्षा के लिए भटक रहा हूँ। आप कौन हैं?
भगवान बोले – मैं सत्यनारायण नामक देवता हूँ। यदि तुम मेरा व्रत करोगे तो सभी दुःखों से मुक्त हो जाओगे। यह व्रत सत्यनारायण भगवान का है। इसे पूर्ण श्रद्धा से करो।
भगवान ने उसे व्रत की विधि बताई और अंतर्धान हो गए। उस ब्राह्मण ने व्रत का संकल्प लिया। उसी रात उसे स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए और कहा – उठो, तुम्हारा कल्याण होगा। प्रातः उठकर उसने व्रत किया। धीरे-धीरे उसकी दरिद्रता दूर हो गई और वह सुखी हो गया। तभी से वह नियमित रूप से यह व्रत करने लगा।
तृतीय अध्याय: एक लकड़हारे की कथा
एक समय उसी नगर में एक गरीब लकड़हारा रहता था। एक दिन वह लकड़ी बेचने के लिए नगर में आया और उसने ब्राह्मण के घर में व्रत होते देखा। उसने पूछा – हे ब्राह्मण देव! यह क्या हो रहा है?
ब्राह्मण ने सत्यनारायण व्रत का महत्व बताया। लकड़हारे ने कहा – मैं भी यह व्रत करूंगा और अपनी कमाई का कुछ भाग भगवान को अर्पित करूंगा। उसने ऐसा ही किया। भगवान की कृपा से वह धनी हो गया। एक दिन उसने व्रत का संकल्प लिया, लेकिन अपनी पत्नी को बताए बिना ही व्रत करने लगा। पत्नी ने पूछा तो उसने कहा – मैं व्यापार की योजना बना रहा हूँ।
पत्नी ने छल से सत्यनारायण का प्रसाद (जिसमें केले, घी, शक्कर, गेहूँ का आटा था) चुरा लिया और स्वयं खा लिया। उसी समय उसके सारे धन का नाश हो गया और वह पुनः गरीब हो गया। तब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने पश्चाताप किया और पुनः श्रद्धापूर्वक व्रत किया। भगवान प्रसन्न हुए और उसका खोया हुआ धन वापस मिल गया।
चतुर्थ अध्याय: राजा उल्कामुख की कथा
एक बार साधुवन नामक नगर में तेजस्वी नामक एक राजा राज करता था। वह प्रतिदिन सत्यनारायण भगवान का पूजन करता था। एक दिन वह व्रत कर रहा था कि एक बाण लगने से उसकी मृत्यु हो गई। भगवान की कृपा से वह राजा उल्कामुख के रूप में जन्मा और पुनः राज्य पाया।
एक बार उसने अपनी पत्नी और पुत्र के साथ व्रत किया। दैवयोग से उसका शत्रु उस पर आक्रमण करने आ गया। राजा ने व्रत पूरा किए बिना ही युद्ध के लिए प्रस्थान किया। युद्ध में वह बंदी बना लिया गया। तब उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने मन ही मन भगवान से क्षमा मांगी। भगवान प्रसन्न हुए और उसकी रक्षा की। उसका शत्रु परास्त हुआ और राजा सकुशल घर लौट आया। उसने पुनः विधिपूर्वक व्रत किया और आनन्दपूर्वक राज्य करने लगा।
पंचम अध्याय: एक साधु व्यापारी की कथा
एक बार सिंहल द्वीप में एक धनी साधु नामक व्यापारी रहता था। उसने सत्यनारायण व्रत का संकल्प लिया। एक बार वह व्यापार हेतु समुद्र यात्रा पर निकला। भगवान ने उसकी परीक्षा लेने के लिए एक भयंकर तूफान उत्पन्न किया। नाव डूबने लगी।
साधु ने भगवान से प्रार्थना की – हे प्रभु! यदि मैं सकुशल घर पहुंच गया तो आपका व्रत करूंगा। भगवान प्रसन्न हुए और तूफान शांत हो गया। व्यापारी घर लौटा। किन्तु समय बीतने पर वह व्रत करना भूल गया। भगवान ने उसे सजा देने के लिए उसका सारा धन नष्ट कर दिया। तब उसे अपनी भूल याद आई। उसने तुरंत व्रत किया और भगवान ने उसका खोया धन लौटा दिया।
व्रत विधि एवं आरती
व्रत विधि:
- तिथि: पूर्णिमा, एकादशी, संक्रान्ति या किसी भी शुभ दिन।
- सामग्री: गंगाजल, तुलसीदल, पंचामृत, फल, फूल, केला, तुलसी, चंदन, घी का दीपक, कपूर, धूप, अगरबत्ती, पंचमेवा, मेवा, गेहूँ का आटा, चीनी, घी।
- संकल्प: “मम कुटुम्बस्य सुखसौभाग्यवृद्धयर्थे श्री सत्यनारायण प्रीत्यर्थं व्रतमहं करिष्ये।”
- कथा श्रवण: उपरोक्त कथा का पाठ या श्रवण करें।
- प्रसाद वितरण: आटे और चीनी के हलवे (या केले का प्रसाद) का भोग लगाकर सभी को वितरित करें।
श्री सत्यनारायण आरती
जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद करत निराजन, घंटा ध्वनि बाजे॥प्रगट भए कलियुग में, सत्य नाम धरायो।
बंदीछोड़ नाम तिहारो, सब नर कहत आयो॥उमा रमा सहित, विष्णु प्रेम अलबेली।
शंख चक्र गदा पदमा, सोहे हाथ खेली॥श्री सत्यनारायण की आरती, जो कोई नर गावे।
कहते हैं शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥
फलश्रुति:
जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। उसे धन-धान्य, सुख-समृद्धि और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस कलियुग में सत्यनारायण व्रत से बढ़कर कोई दूसरा व्रत नहीं है।
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥