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पुत्रदा एकादशी: संतान प्राप्ति का अचूक व्रत Putrada Ekadashi 2025
भारतीय संस्कृति में ‘एकादशी’ का व्रत सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। लेकिन साल की 24 एकादशियों में से दो एकादशियां ऐसी हैं, जो सिर्फ मोक्ष नहीं देतीं, बल्कि एक परिवार के सबसे बड़े सपने को पूरा करती हैं—संतान का सुख।
इस व्रत का नाम है—पुत्रदा एकादशी (pausha putrada ekadashi)।
‘पुत्रदा’ का अर्थ है—’पुत्र देने वाली’। हर विवाहित जोड़े का सपना होता है कि उनके आंगन में भी किलकारियां गूंजें, उनका वंश आगे बढ़े। लेकिन कई बार मेडिकल साइंस की तमाम कोशिशों और दवाओं के बाद भी गोद सूनी रह जाती है। जहाँ दवा काम नहीं करती, वहां ‘दुआ’ और ‘विश्वास’ काम करता है।
पुराणों के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से नि:संतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति होती है और जिनकी संतान है, उनके बच्चों की रक्षा होती है। यह व्रत साल में दो बार आता है—एक बार सावन (श्रावण) मास में और दूसरी बार पौष मास में।
‘द मंदिर दर्शन’ के इस विशेष लेख में हम आपको बताएंगे कि पुत्रदा एकादशी का व्रत कैसे रखें, इसकी प्राचीन कथा क्या है और संतान गोपाल मंत्र का जाप कैसे करें।
पुत्रदा एकादशी कब आती है?
जैसा कि हमने बताया, यह साल में दो बार आती है और दोनों का महत्व समान है:
- श्रावण पुत्रदा एकादशी (Shravan Putrada Ekadashi): यह सावन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है (आमतौर पर जुलाई या अगस्त में)।
- पौष पुत्रदा एकादशी (Paush Putrada Ekadashi): यह पौष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है (आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में)।
यह व्रत भगवान विष्णु, विशेष रूप से उनके बाल गोपाल (Bal Gopal) रूप को समर्पित है।
इस व्रत का महत्व: संतान ही क्यों?
पद्म पुराण में भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताई है।
हिंदू धर्म में माना जाता है कि ‘पुत्र’ नाम का अर्थ है—’पुम’ नामक नरक से रक्षा करने वाला (पुत्र = पुम + त्र)। यानी वह संतान जो माता-पिता का तर्पण कर उन्हें मोक्ष दिलाए।
- नि:संतान के लिए: यह व्रत उन जोड़ों के लिए आशा की किरण है जो माता-पिता बनने के लिए तरस रहे हैं।
- संतान वालों के लिए: अगर आपके बच्चे बीमार रहते हैं, पढ़ाई में कमजोर हैं, या बुरी संगति में पड़ गए हैं, तो उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए माताएं यह व्रत रखती हैं।
- मोक्ष के लिए: जो भी यह व्रत रखता है, उसे अंत में वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा
किसी भी व्रत का फल तब तक नहीं मिलता जब तक उसकी कथा न सुनी जाए। पुत्रदा एकादशी की कथा बहुत भावुक करने वाली है।
राजा सुकेतुमान की कहानी
प्राचीन काल में भद्रावती नगरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनके पास सब कुछ था—धन, दौलत, विशाल राज्य और प्रजा का प्यार। लेकिन फिर भी राजा और रानी शैव्या हमेशा उदास रहते थे। कारण एक ही था—वे नि:संतान थे।
राजा को चिंता थी कि उनके मरने के बाद उनका पिंडदान कौन करेगा? उनका वंश कैसे चलेगा? यही चिंता उन्हें दिन-रात खाए जा रही थी।
एक दिन राजा दुखी होकर जंगल की ओर निकल गए। वहां वे एक सरोवर (तालाब) के किनारे पहुंचे। उन्होंने देखा कि वहां कई ऋषि-मुनि वेद पाठ कर रहे हैं। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और पूछा, “हे महात्माओं! आप लोग यहाँ किस प्रयोजन से एकत्रित हुए हैं?”
ऋषियों ने उत्तर दिया, “राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। जो भी आज के दिन भगवान विष्णु का व्रत रखकर इस सरोवर में स्नान करता है, उसे सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।”
राजा की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने ऋषियों से विनती की, “हे मुनिवर! मेरे पास सब कुछ है, पर संतान नहीं। क्या मैं भी यह व्रत कर सकता हूं?”
ऋषियों ने राजा को व्रत की विधि बताई। राजा सुकेतुमान ने उसी दिन विधि-विधान से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा, रात्रि जागरण किया और अगले दिन द्वादशी को पारण किया।
व्रत के प्रभाव से कुछ ही समय बाद रानी शैव्या गर्भवती हुईं और उन्होंने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। वह राजकुमार आगे चलकर एक महान चक्रवर्ती राजा बना।
तभी से यह मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया यह व्रत कभी खाली नहीं जाता।
पुत्रदा एकादशी पूजा विधि
संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत में नियमों का पालन बहुत जरूरी है। पति और पत्नी दोनों को मिलकर यह व्रत करना चाहिए।
दशमी (व्रत से एक दिन पहले):
- इस दिन सात्विक भोजन करें। प्याज, लहसुन, मसूर की दाल और बैंगन न खाएं।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- सूर्यास्त के बाद अन्न ग्रहण न करें।
एकादशी (व्रत का दिन):
- स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर (ब्रह्म मुहूर्त में) स्नान करें। हाथ में जल और फूल लेकर संकल्प लें: “हे श्री हरि! मैं (अपना नाम) संतान प्राप्ति/संतान की रक्षा की कामना से आज पुत्रदा एकादशी का निर्जला/फलाहारी व्रत रख रहा हूँ/रही हूँ। आप इसे स्वीकार करें।”
- बाल गोपाल की स्थापना: पूजा घर में एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान विष्णु या बाल गोपाल (लड्डू गोपाल) की मूर्ति स्थापित करें।
- अभिषेक: दक्षिणावर्ती शंख में केसर मिला दूध भरकर भगवान का अभिषेक करें। यह संतान प्राप्ति के लिए बहुत शुभ माना जाता है।
- शृंगार और भोग: भगवान को पीले वस्त्र, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। भोग में पंचामृत और पीले फल (केला/आम) चढ़ाएं।
- संतान गोपाल मंत्र: पूजा के समय पति-पत्नी साथ बैठकर तुलसी की माला से ‘संतान गोपाल मंत्र’ का 108 बार जाप करें।
- कथा श्रवण: हाथ में फूल और अक्षत लेकर व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- आरती: अंत में कपूर से भगवान की आरती करें और भूल-चूक की माफी मांगें।
रात्रि जागरण:
एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। भगवान के भजन गाएं या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का कीर्तन करें।
द्वादशी (अगले दिन):
अगले दिन सूर्योदय के बाद स्नान करें। किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं, दक्षिणा दें और फिर व्रत खोलें (पारण करें)।
संतान प्राप्ति का विशेष मंत्र
अगर आप विशेष रूप से बच्चे के लिए यह व्रत कर रहे हैं, तो इस मंत्र का जाप बहुत शक्तिशाली माना जाता है। इसे पूजा के समय कम से कम 1 माला जरूर जपें:
मंत्र:
|| ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ||
(अर्थ: हे देवकी नंदन, हे गोविन्द, हे वासुदेव, हे जगत के स्वामी! मैं आपकी शरण में हूँ। मुझे पुत्र (संतान) प्रदान करें।)
व्रत के नियम: क्या करें और क्या न करें
इस व्रत की सफलता नियमों पर निर्भर करती है।
क्या करें :
- निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखना सबसे श्रेष्ठ है। यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे, तो फलाहार (दूध, फल, मेवे) ले सकते हैं।
- तुलसी पत्र का प्रयोग पूजा में जरूर करें। (ध्यान रहे: एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें, एक दिन पहले तोड़कर रख लें)।
- मन को शांत रखें, गुस्सा न करें।
क्या न करें:
- चावल (Rice): एकादशी के दिन चावल खाना और घर में बनाना वर्जित है।
- अन्न: व्रत न रखने वाले परिवार के सदस्य भी इस दिन सात्विक भोजन ही करें।
- सोना: दिन में सोना नहीं चाहिए।
- दातुन: एकादशी के दिन पेड़-पौधों की टहनी तोड़ना मना है, इसलिए दातुन न करें (सिर्फ कुल्ला कर लें)।
- कलह: घर में पति-पत्नी झगड़ा बिल्कुल न करें।
पुत्रदा एकादशी पर विशेष उपाय
अगर मेडिकल रिपोर्ट में सब ठीक है फिर भी संतान नहीं हो रही, तो पुत्रदा एकादशी पर ये छोटे उपाय करें:
- झूला झुलाएं: लड्डू गोपाल को पालने में बैठाकर पति-पत्नी मिलकर झूला झुलाएं।
- चांदी की बांसुरी: भगवान कृष्ण को छोटी सी चांदी की बांसुरी अर्पित करें। बाद में उसे अपने बेडरूम में रखें।
- मक्खन-मिश्री: बाल गोपाल को माखन-मिश्री का भोग लगाएं और उसे प्रसाद रूप में पति-पत्नी ग्रहण करें।
- पीपल की सेवा: पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है। एकादशी की शाम को पीपल के नीचे घी का दीपक जलाएं।
निष्कर्ष Putrada Ekadashi 2025
‘पुत्रदा एकादशी’ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि एक विश्वास है कि ईश्वर की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता, तो जीवन कैसे आ सकता है?
जब विज्ञान हार मान लेता है, तब आध्यात्म शुरू होता है। राजा सुकेतुमान की तरह अगर आप भी सच्चे मन, पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से इस व्रत को रखेंगे, तो भगवान विष्णु की कृपा से आपकी सूनी गोद जरूर भरेगी।
निराश न हों। लड्डू गोपाल पर भरोसा रखें।