षटतिला एकादशी: पुण्य और मोक्ष प्रदायिनी तिथि

1. परिचय 

हिंदू धर्मग्रंथों में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन माघ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली षटतिला एकादशी का स्थान अत्यंत अद्वितीय है। ‘षट्’ का अर्थ है छह और ‘तिल’ का अर्थ है तिल के बीज। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस दिन तिल का छह विशिष्ट रूपों में उपयोग किया जाता है। यह एकादशी केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर के शुद्धिकरण और परोपकार की भावना को जागृत करने का पर्व है।पद्म पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार, यह एकादशी मनुष्य के समस्त पापों का नाश करने वाली और बैकुंठ धाम की प्राप्ति कराने वाली मानी गई है।इस वर्ष यह एकादशी  २०२६  में १४  जनवरी, बुधवार को है, जो माघ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी |  इस दिन तिल का दान और भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी होती है |

आइये  एक पौराणिक कथा के द्वारा इसका महत्व जानते हैं |

2. पौराणिक कथा और महत्व :

‘भविष्योत्तर पुराण’ के अनुसार, भगवान कृष्ण ने स्वयं इस एकादशी की महिमा युधिष्ठिर को सुनाई थी।

कथा: प्राचीन काल में एक ब्राह्मणी थी जो भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। उसने कठिन तपस्या और व्रत किए, जिससे उसका शरीर तो शुद्ध हो गया, लेकिन उसने कभी किसी भूखे व्यक्ति को भोजन दान नहीं किया।

जब भगवान विष्णु ने एक भिक्षु के रूप में उससे भिक्षा मांगी, तो उसने भोजन के बजाय उनके पात्र में मिट्टी का एक ढेला डाल दिया। मृत्यु के पश्चात, जब वह स्वर्ग पहुंची, तो उसे रहने के लिए एक सुंदर महल तो मिला, लेकिन वह पूरी तरह खाली था—वहां न भोजन था, न सुख-सुविधा। तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि “मिट्टी दान” करने के कारण उसे शून्य फल मिला। उन्होंने उसे षटतिला एकादशी का व्रत करने और तिल दान करने का निर्देश दिया।

भगवान ने उसे उपाय बताया कि जब देव-कन्याएं तुमसे मिलने आएंगे, तब तुम उनसे ‘षटतिला एकादशी’ के व्रत की विधि पूछना और उसका पालन करना। ब्राह्मणी ने वैसा ही किया और विधिपूर्वक षटतिला एकादशी का व्रत रखा। तिल के छह प्रकार के दान और प्रभाव से उसका महल धन-धान्य और अन्न से भर गया। वह स्वयं भी दिव्य रूप वाली हो गई इस व्रत के प्रभाव से उसका महल धन-धान्य से भर गया।

सीख: यह कथा हमें सिखाती है कि केवल पूजा-पाठ पर्याप्त नहीं है; दान और सेवा के बिना आध्यात्मिक यात्रा अधूरी है। अगर हमारी जीवनशैली सहानुभूति से परिपूर्ण है तो ही हमारा जीवन का उद्देश्य सफल होगा | 

3. तिल के  छह उपयोग :

षटतिला एकादशी के दिन तिल का उपयोग निम्नलिखित छह तरीकों से करना अनिवार्य माना गया है, जो पापों का नाश और पुण्य की वृद्धि करते हैं:

  1. तिल स्नान : पानी में तिल मिलाकर स्नान करना (शारीरिक शुद्धि)।
  2. तिल उबटन : शरीर पर तिल का लेप लगाना (त्वचा और स्वास्थ्य के लिए)।
  3. तिल तर्पण : पितरों को तिल मिश्रित जल अर्पित करना (पूर्वजों की शांति)।
  4. तिल अर्घ्य : जल में तिल मिलाकर भगवान को अर्घ्य देना।
  5. तिल होम : पवित्र अग्नि (हवन) में तिल की आहुति देना।
  6. तिल दान : गरीबों और ब्राह्मणों को तिल का दान करना।

तिल के छह अनुष्ठानों का आध्यात्मिक महत्व जाने : 

 “तिल के छह अनुष्ठानों से हम तिल की पवित्र शक्ति को  प्राप्त कर सकते हैं और अपने शरीर, मन और आत्मा का शुद्धिकरण कर सकते हैं | हम पवित्र ‘तिल’ की दिव्य शक्ति से अपनी काया, बुद्धि और अंतरात्मा को निर्मल बना सकते हैं | “

4. आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व :

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यह दिन ‘त्याग’ और ‘परिवर्तन’ का प्रतीक है। तिल का छोटा सा दाना ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।

  • अहंकार का त्याग : ब्राह्मणी द्वारा मिट्टी दान करना अहंकार का प्रतीक था। षटतिला एकादशी हमें सिखाती है कि हमें अपने सबसे प्रिय वस्तु (संसाधन) दूसरों के साथ साझा करनी चाहिए।
  • कर्मों का शुद्धिकरण : माना जाता है कि तिल के उपयोग से सात जन्मों के पाप धुल जाते हैं, जो वास्तव में नकारात्मक संस्कारों को मिटाने का एक रूप है।

5. वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण :

 हिंदू कैलेंडर के अनुसार माघ मास (जनवरी-फरवरी) कड़ाके की ठंड का समय होता है। इस समय तिल का उपयोग अत्यधिक वैज्ञानिक है:

  • तापमान नियंत्रण: तिल की प्रकृति ‘गर्म’ होती है। ठंड के मौसम में इसका सेवन शरीर को आंतरिक गर्मी प्रदान करता है।
  • पोषण: तिल कैल्शियम, मैग्नीशियम और ओमेगा-6 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं। उपवास के दौरान तिल का सेवन ऊर्जा के स्तर को बनाए रखता है।
  • त्वचा की देखभाल: सर्दियों में त्वचा शुष्क हो जाती है। ‘तिल उबटन’ और ‘तिल स्नान’ प्राकृतिक मॉइस्चराइजर का काम करते हैं और त्वचा के रोगों को दूर रखते हैं।

6. व्रत की विधि और नियम :  

प्रातः कालसंकल्प और स्नानसूर्योदय से पूर्व तिल के जल से स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
पूजाविष्णु पूजनभगवान विष्णु को धूप, दीप और तिल के लड्डू अर्पित करें।
दिन भरमौन या मंत्र जप‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का निरंतर मानसिक जाप करें।
भोजनफलाहारअनाज और दालों का त्याग करें। तिल से बनी चीजों का सेवन करें।
रात्रिजागरणविष्णु सहस्रनाम का पाठ करें या कीर्तन करें।
अगले दिनपारणद्वादशी के दिन ब्राह्मण को दान देकर व्रत खोलें।

यदि आप इस व्रत का पालन करना चाहते हैं, तो इन चरणों का अनुसरण करें:

व्रत की संक्षिप्त विधि :

प्रातः काल उठकर तिल मिश्रित जल से स्नान करें।

भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल और तिल से स्नान कराएं।

‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करते हुए गंध, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।

विशेष रूप से तिल के लड्डुओं का भोग लगाएं।

पूरे दिन निराहार रहकर या फलाहार (तिल युक्त) लेकर व्रत का पालन करें।

रात्रि में जागरण कर भगवान का कीर्तन करें और अगले दिन द्वादशी को दान-पुण्य के बाद व्रत का पारण करें। २०२६ में इस व्रत का पारण तिथि १५ जनवरी २०२६ को है और पारण  का समय 7 :15 am से 9 :21 am सूर्योदय के पश्चात करना होगा |

षटतिला एकादशी का आध्यात्मिक फल :

पुराणों के अनुसार, षटतिला एकादशी का व्रत रखने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं :

पापों का नाश : जाने-अनजाने में किए गए मानसिक, वाचिक और शारीरिक पाप इस व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाते हैं।

दरिद्रता से मुक्ति : जो व्यक्ति इस दिन तिल का दान करता है, उसे जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता से मुक्ति मिलती है।

स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति : तिल दान करने वाले व्यक्ति को उतने ही हजार वर्षों तक स्वर्ग में सुख भोगने का अवसर 

मिलता है, जितने तिल उसने दान किए होते हैं।

मानसिक शुद्धि : यह व्रत मनुष्य के भीतर के अहंकार को कम कर उसमें सेवा और दान की भावना जागृत करता है।

सार-संक्षेप :

अतः षटतिला एकादशी हमें यह सिखाती है कि भक्ति के साथ-साथ ‘दान’ का जीवन में अत्यंत महत्व है। केवल स्वयं की आध्यात्मिक उन्नति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के प्रति दया और दान का भाव ही हमें पूर्णता प्रदान करता है।

सच्चे मन से भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए षटतिला एकादशी का व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

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