राहु-केतु की कहानी | rahu ketu kahani in hindi

भारतीय ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में अगर कोई दो नाम सबसे ज्यादा रहस्य और डर पैदा करते हैं, तो वे हैं—राहु और केतु।

हम अक्सर सुनते हैं कि “राहु की दशा चल रही है” या “ग्रहण लगने वाला है।” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये दोनों हैं कौन? इनका जन्म कैसे हुआ? एक राक्षस के दो टुकड़े होकर भी वे आज तक जिंदा कैसे हैं? और सबसे बड़ा सवाल—आखिर क्यों ये दोनों छाया ग्रह (Shadow Planets) सूर्य और चंद्रमा के इतने बड़े दुश्मन बन गए कि आज भी उन्हें निगलने (ग्रहण लगाने) के लिए दौड़ते हैं?

यह कहानी केवल एक राक्षस के वध की नहीं है। यह कहानी है देवताओं और असुरों के सबसे बड़े संघर्ष की—समुद्र मंथन (Samudra Manthan) की। यह कहानी है छल, कपट, अमृत की लालसा और भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र की।

‘द मंदिर दर्शन’ के इस विस्तृत लेख में, हम आपको इतिहास के उन पन्नों में ले चलेंगे जहाँ इस ब्रह्मांडीय नाटक की शुरुआत हुई थी।

इस कहानी की नींव राहु के जन्म से बहुत पहले पड़ गई थी।
बात उस समय की है जब देवराज इंद्र अपनी शक्ति और वैभव के नशे में चूर थे। एक बार महर्षि दुर्वासा (जो अपने क्रोध के लिए जाने जाते हैं) वैकुंठ से लौट रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट इंद्र से हुई। महर्षि ने प्रसन्न होकर इंद्र को भगवान विष्णु की एक दिव्य माला भेंट की।

लेकिन अभिमान में चूर इंद्र ने वह माला अपने गले में डालने की बजाय अपने हाथी, ऐरावत के मस्तक पर रख दी। हाथी ने अपनी सूंड से उस माला को नीचे फेंक दिया और उसे पैरों तले रौंद दिया।

यह देखकर महर्षि दुर्वासा का क्रोध फूट पड़ा। उन्होंने इंद्र को श्राप दिया:
“इंद्र! जिस वैभव के अहंकार में तुमने भगवान के प्रसाद का अपमान किया है, वह वैभव तुमसे छिन जाएगा। तुम और तुम्हारे देवता श्री-हीन (शक्तिहीन) हो जाओगे।”

श्राप असर तुरंत हुआ। तीनों लोकों से लक्ष्मी (समृद्धि) चली गई। देवता कमजोर हो गए और असुरों (राक्षसों) ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। इंद्र और बाकी देवता जान बचाकर भगवान विष्णु की शरण में गए।

भगवान विष्णु ने देवताओं की दशा देखी और कहा, “इस समय असुर तुमसे ज्यादा बलवान हैं। युद्ध से काम नहीं चलेगा, कूटनीति अपनानी होगी। तुम्हें असुरों के साथ मिलकर क्षीर सागर (Ocean of Milk) का मंथन करना होगा। उस मंथन से ‘अमृत’ निकलेगा, जिसे पीकर तुम अमर हो जाओगे और अपनी खोई हुई शक्ति वापस पा लोगे।”

देवताओं ने अनिच्छा से ही सही, असुरों के राजा बलि से बात की। अमृत के लालच में असुर भी मंथन के लिए तैयार हो गए।

मंथन कोई साधारण काम नहीं था।

  • मथानी (Churner): मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया।
  • रस्सी (Rope): नागों के राजा वासुकी को रस्सी बनाया गया।
  • आधार (Base): पर्वत समुद्र में डूब न जाए, इसके लिए भगवान विष्णु ने ‘कूर्म’ (कछुआ) अवतार लेकर पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला।

देवताओं ने वासुकी नाग की पूंछ पकड़ी और असुरों ने मुंह। और इस तरह शुरू हुआ इतिहास का सबसे बड़ा मंथन।

समुद्र मंथन बहुत लंबा चला। इसमें से पहले ‘हलाहल’ विष निकला, जिसे भगवान शिव ने पी लिया (जिससे वे नीलकंठ कहलाए)। इसके बाद कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि और देवी लक्ष्मी निकलीं।

अंत में, भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।

अमृत को देखते ही देवताओं और असुरों में हाहाकार मच गया। असुरों ने झपट्टा मारकर अमृत कलश छीन लिया और उसे लेकर भागने लगे। देवताओं को लगा कि अब सब खत्म हो गया। अगर असुरों ने अमृत पी लिया, तो सृष्टि का विनाश तय था।

तब भगवान विष्णु ने अपनी माया रची। उन्होंने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया—मोहिनी अवतार।

मोहिनी का रूप इतना मनमोहक था कि असुर अपनी सुध-बुध खो बैठे। मोहिनी ने असुरों से कहा, “तुम लोग क्यों लड़ रहे हो? यह कलश मुझे दे दो। मैं तुम दोनों (देव और असुर) में बराबर-बराबर अमृत बांट दूंगी।”

असुर मोहिनी के सौंदर्य जाल में ऐसे फंसे कि उन्होंने अमृत कलश उसे सौंप दिया। मोहिनी ने एक शर्त रखी—”मैं जैसा कहूँगी, वैसा करना होगा।” असुर मान गए।

दो पंक्तियां (Lines) बनाई गईं। एक तरफ देवता बैठे और दूसरी तरफ असुर। मोहिनी ने देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया और असुरों को अपनी मुस्कान और नृत्य में उलझाए रखा।

असुरों की पंक्ति में एक राक्षस बैठा था जिसका नाम था—स्वभानु (Swarbhanu)।

स्वभानु कोई साधारण राक्षस नहीं था। वह बहुत चतुर, धूर्त और observant (निरीक्षक) था। उसे विप्रचित्ति और सिंहिका का पुत्र माना जाता है। जब मोहिनी देवताओं को अमृत पिला रही थी, तो स्वभानु को शक हो गया। उसने देखा कि मोहिनी केवल देवताओं को अमृत दे रही है और असुरों को केवल मीठी बातों में बहला रही है।

स्वभानु समझ गया कि यह स्त्री कोई और नहीं, बल्कि मायावी विष्णु हैं। उसने सोचा, “अगर मैं यहाँ बैठा रहा, तो मुझे अमृत कभी नहीं मिलेगा।”

स्वभानु ने तुरंत एक खतरनाक योजना बनाई। उसने अपना रूप बदला और देवताओं का वेश धारण कर लिया। चुपके से, बिना किसी आहट के, वह जाकर सूर्य देव (Sun) और चंद्र देव (Moon) के बीच में बैठ गया।

मोहिनी रूपी विष्णु अमृत परोसते हुए आगे बढ़ रहे थे। जैसे ही वे स्वभानु के पास पहुंचे, उन्होंने उसे देवता समझकर अमृत की कुछ बूंदें उसके मुंह में डाल दीं।

जैसे ही अमृत स्वभानु के गले में उतरा, उसे अद्भुत शक्ति महसूस होने लगी।
लेकिन, उसी क्षण सूर्य और चंद्रमा (जो प्रकाश के देवता हैं और कुछ भी उनसे छिप नहीं सकता) ने स्वभानु को पहचान लिया।

सूर्य और चंद्रमा जोर से चिल्लाए: “प्रभु! यह देवता नहीं है! यह असुर स्वभानु है जिसने छल से अमृत पी लिया है!”

यह सुनते ही भगवान विष्णु ने अपना मोहिनी रूप त्याग दिया। उन्हें अपनी चूक और असुर की धूर्तता पर क्रोध आ गया। उन्होंने एक पल की भी देरी नहीं की और अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया।

सुदर्शन चक्र बिजली की गति से आया और उसने स्वभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया।

लेकिन… तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

अमृत की कुछ बूंदें स्वभानु के गले से नीचे उतर चुकी थीं। अमृत के प्रभाव से उसका सिर और उसका धड़—दोनों अमर हो चुके थे। सिर कटने के बाद भी उसकी मृत्यु नहीं हुई।

  • सिर (Head): कटा हुआ सिर “राहु” कहलाया।
  • धड़ (Body): बिना सिर का धड़ “केतु” कहलाया।
राहु-केतु की कहानी
राहु-केतु की कहानी

ब्रह्मा जी ने इस घटना को देखा और उन्होंने हस्तक्षेप किया। चूंकि अब वे अमर हो चुके थे, उन्हें मारा नहीं जा सकता था। इसलिए, उन्हें ग्रहों (Planets) का दर्जा दिया गया, लेकिन ‘छाया ग्रह’ (Shadow Planets) के रूप में।

  • राहु (सिर): इसके पास दिमाग है, मुंह है, लेकिन पेट नहीं है। इसलिए इसकी भूख कभी शांत नहीं होती। यह हमेशा असंतुष्ट रहता है। यह भ्रम, छल, राजनीति और दुनियावी इच्छाओं का कारक बना।
  • केतु (धड़): इसके पास दिल है, लेकिन दिमाग (सिर) नहीं है। इसलिए यह तर्क नहीं समझता, सिर्फ महसूस करता है। यह मोक्ष, वैराग्य और आध्यात्म का कारक बना।

सूर्य और चंद्र से दुश्मनी (The Eternal Enmity)
राहु और केतु ने अपनी इस हालत का जिम्मेदार सूर्य और चंद्रमा को माना। उन्होंने कसम खाई कि “तुम दोनों ने मेरी पहचान उजागर की है, इसलिए मैं तुम्हें कभी चैन से नहीं रहने दूंगा।”

यही कारण है कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, समय-समय पर राहु सूर्य और चंद्रमा को निगलने के लिए आता है।

  • जब राहु सूर्य को निगलता है, तो सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) होता है।
  • जब राहु चंद्रमा को निगलता है, तो चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) होता है।

लेकिन, क्योंकि राहु के पास पेट नहीं है (गला कटा हुआ है), इसलिए सूर्य और चंद्रमा कुछ ही देर में उसके गले से बाहर निकल आते हैं और ग्रहण समाप्त हो जाता है। यह खेल अनंत काल से चल रहा है।

यह कहानी सिर्फ एक मिथक नहीं है, यह हमारे जीवन के मनोविज्ञान को दर्शाती है।

  1. राहु (हमारी इच्छाएं): राहु उस ‘सिर’ की तरह है जो सब कुछ चखना चाहता है। आज के कलयुग में इंटरनेट, सोशल मीडिया, नशा, और अचानक अमीर बनने की चाहत—यह सब राहु है। यह हमें भ्रम में डालता है।
  2. केतु (हमारा मोक्ष): केतु वह धड़ है जिसे दुनिया से कोई मतलब नहीं। जब हमें जीवन में ठोकर लगती है और हम भगवान की तरफ भागते हैं, तो वह केतु है। केतु हमें चीजों से अलग (Detach) करता है।

अमृत का पाठ:
राहु-केतु की कहानी हमें सिखाती है कि “पात्रता के बिना प्राप्ति विनाश का कारण बनती है।”
स्वभानु ने अमृत पी तो लिया, लेकिन वह उसे पचा नहीं पाया और हमेशा के लिए खंडित हो गया। जीवन में हमें जो भी मिले, उसे पाने के लिए हमारी योग्यता (Eligibility) होनी चाहिए, छल से पाई गई सफलता राहु की तरह अधूरी होती है।

भारत में ऐसे कई मंदिर हैं जहां राहु और केतु की विशेष पूजा की जाती है। यदि आपकी कुंडली में ‘काल सर्प दोष’ या राहु-केतु की दशा है, तो इन स्थानों के दर्शन जरूर करने चाहिए:

  1. श्रीकालहस्ती मंदिर (आंध्र प्रदेश): यह तिरुपति के पास स्थित है। यहाँ राहु और केतु की शांति के लिए विशेष पूजा होती है। यहाँ शिव जी वायु लिंग के रूप में विराजमान हैं।
  2. नागनाथस्वामी मंदिर (तमिलनाडु): यहाँ राहु को एक विशेष देवता के रूप में पूजा जाता है। यहाँ राहु का दूध से अभिषेक करने पर दूध का रंग नीला हो जाता है।
  3. केतु मंदिर (कीझपेरुमपल्लम, तमिलनाडु): यह विशेष रूप से केतु को समर्पित मंदिर है।

राहु और केतु की कहानी हमें बताती है कि इस ब्रह्मांड में ‘अंधेरा’ और ‘उजाला’ दोनों का महत्व है।
भगवान विष्णु ने स्वभानु का वध नहीं किया, बल्कि उसे ग्रह बना दिया। क्यों? क्योंकि सृष्टि को चलाने के लिए भ्रम (राहु) और मोक्ष (केतु) दोनों की जरूरत है।

राहु हमें दुनिया दिखाता है, और केतु हमें दुनिया से मुक्त करता है।

जब भी आप आकाश में ग्रहण देखें, तो याद रखें कि यह उसी पौराणिक संघर्ष का प्रतीक है जो हजारों साल पहले क्षीर सागर के तट पर शुरू हुआ था।

ॐ राहवे नमः! ॐ केतवे नमः!

FAQs

राहु और केतु में से ज्यादा खतरनाक कौन है?

दोनों का काम अलग है। राहु मानसिक भ्रम और सांसारिक कष्ट देता है, जबकि केतु शारीरिक कष्ट और अलगाव देता है। लेकिन ज्योतिष में राहु को थोड़ा ज्यादा आक्रामक माना जाता है क्योंकि वह दिमाग (Scheming mind) है।

 राहु-केतु किसके भक्त हैं?

वे भगवान शिव के परम भक्त हैं। जो व्यक्ति शिव जी की पूजा करता है, राहु-केतु उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

क्या राहु-केतु कभी एक होते हैं?

पौराणिक रूप से वे एक ही शरीर (स्वभानु) थे, लेकिन अब वे आकाशीय मंडल में हमेशा एक-दूसरे से 180 डिग्री की दूरी पर (आमने-सामने) रहते हैं। वे कभी नहीं मिलते।

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