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प्रदोष व्रत कथा
प्राचीनकाल की बात है। एक नगर में एक अत्यंत निर्धन किंतु धर्मनिष्ठ पुजारी निवास करता था। वह भगवान शिव का परम भक्त था और प्रतिदिन निष्ठापूर्वक उनकी पूजा-अर्चना करता था। यद्यपि उसके पास धन-संपत्ति का अभाव था, फिर भी उसका जीवन संतोष, सेवा और भक्ति से परिपूर्ण था। दुर्भाग्यवश एक दिन अकाल मृत्यु के कारण उस पुजारी का देहांत हो गया।
पुजारी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में न कोई सहारा था और न ही आजीविका का कोई साधन। उसके पास केवल एक छोटा पुत्र था, जिसे लेकर वह अपने जीवन का निर्वाह करने लगी। वह प्रतिदिन पुत्र को साथ लेकर नगर में भीख माँगती और संध्या समय जो कुछ मिलता, उसी से जीवन यापन करती थी। घोर दरिद्रता के बावजूद वह स्त्री अत्यंत धर्मपरायण थी और भगवान शिव में उसकी अटूट आस्था थी।
एक दिन संयोगवश उसकी भेंट एक युवा राजकुमार से हुई। वह राजकुमार विदर्भ देश का था। उसके पिता का देहांत हो चुका था और राज्य के शत्रुओं तथा षड्यंत्रों के कारण उसे अपना राज्य छोड़कर वन-वन भटकना पड़ रहा था। राजसी वेशभूषा त्यागकर वह अत्यंत दीन अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहा था।
पुजारी की विधवा पत्नी ने जब उस राजकुमार की दुर्दशा देखी तो उसका हृदय करुणा से भर गया। उसे लगा मानो यह भी कोई असहाय बालक हो। बिना किसी भेदभाव के उसने राजकुमार को अपने घर ले आई और अपने पुत्र के समान स्नेह देने लगी। यद्यपि उसका स्वयं का जीवन कष्टों से भरा था, फिर भी उसने राजकुमार की सेवा में कोई कमी नहीं आने दी।
कुछ समय पश्चात एक दिन पुजारी की पत्नी अपने दोनों पुत्रों—अपने सगे पुत्र और राजकुमार—को साथ लेकर महान तपस्वी शांडिल्य ऋषि के आश्रम पहुँची। वहाँ उसने ऋषि से भगवान शिव की महिमा, उनकी कृपा और विशेष रूप से प्रदोष व्रत की कथा, विधि और महत्व सुना। ऋषि ने बताया कि त्रयोदशी तिथि को सायंकाल के समय भगवान शिव की पूजा करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि तथा सफलता प्राप्त होती है।
ऋषि के वचनों से प्रभावित होकर पुजारी की पत्नी ने दृढ़ निश्चय किया कि वह जीवन भर प्रदोष व्रत का पालन करेगी। आश्रम से लौटने के बाद उसने नियमपूर्वक प्रत्येक प्रदोष के दिन व्रत रखना आरंभ कर दिया और सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने लगी।
एक बार दोनों बालक वन में भ्रमण के लिए गए। पुजारी का पुत्र तो समय रहते घर लौट आया, परंतु राजकुमार वन की सुंदरता में रम गया। वहाँ उसने कुछ गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा। उनमें से एक कन्या अत्यंत सुंदर, सुशील और तेजस्विनी थी, जिसका नाम अंशुमती था। राजकुमार उससे बातचीत करने लगा और दोनों के बीच आत्मीय संबंध बन गया। इसी कारण वह उस दिन देर से घर लौटा।