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भारतीय काल-गणना और हिंदू धर्मशास्त्रों में ‘उत्तरायण’ को अत्यंत शुभ और पवित्र काल माना गया है। यह वह समय है जब सूर्य देव दक्षिण से उत्तर की ओर गमन करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, यह परिवर्तन केवल खगोलीय नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना के जागरण और देवताओं के दिन के आरंभ का प्रतीक है। यह पर्व केवल उत्सव मात्र नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान, अध्यात्म और प्रकृति के बीच के गहरे अंतर्संबंधों का प्रकटीकरण हैं। इन पर्वों में ‘मकर संक्रांति’ अथवा ‘उत्तरायण’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह पर्व न केवल सूर्य की गति में परिवर्तन का प्रतीक है, बल्कि यह मानव चेतना के ऊर्ध्वगमन और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का संदेश देता है।
उत्तरायण का शब्दार्थ और स्वरूप :
‘उत्तरायण’ शब्द दो संस्कृत शब्दों के मेल से बना है: ‘उत्तर’ और ‘अयन’।
उत्तर : उत्तर दिशा
अयन : गमन या मार्ग
अर्थात, जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर गति करना प्रारंभ करता है, तो उसे उत्तरायण कहते हैं। वर्ष में दो अयन होते हैं—उत्तरायण और दक्षिणायण। मकर संक्रांति वह मिलन बिंदु है जहाँ सूर्य धनु राशि का त्याग कर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी संक्रमण (बदलाव) के कारण इसे ‘संक्रांति’ कहा जाता है।
1. उत्तरायण का शास्त्रीय एवं ज्योतिषीय आधार :
हिंदू ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, वर्ष को दो अयन में विभाजित किया गया है—उत्तरायण और दक्षिणायन।
खगोलीय घटना : जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं (मकर संक्रांति) , तो उत्तरायण का प्रारंभ होता है। इस दिन के बाद से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी।
खगोलीय दृष्टि से उत्तरायण का महत्व अत्यधिक है। पृथ्वी की धुरी के झुकाव के कारण सूर्य की स्थिति बदलती दिखाई देती है।
दिनों का बड़ा होना : मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप रातें छोटी होने लगती हैं और दिन बड़े होने लगते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि प्रकाश की अवधि बढ़ रही है और शीत की ठिठुरन (अंधकार) कम हो रही है।
ऋतु परिवर्तन : यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन की दस्तक देता है। कृषि प्रधान भारत में यह नई फसल की खुशी का भी समय है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस काल में सूर्य की किरणें स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी और ऊर्जादायक होती हैं।
देवताओं का दिन : श्रीमद्भागवत पुराण और मनुस्मृति के अनुसार, छह महीने का उत्तरायण देवताओं का एक ‘दिन’ होता है, जबकि छह महीने का दक्षिणायन देवताओं की ‘रात्रि’ होती है। इसलिए उत्तरायण में किए गए धार्मिक कार्य, दान और तप का फल अनंत गुना प्राप्त होता है।
2 शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक महत्व :
सनातन धर्म के ग्रंथों में उत्तरायण को ‘देवताओं का दिन’ कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार, देवताओं का एक दिन मनुष्यों के छह माह (उत्तरायण) के बराबर होता है और उनकी एक रात्रि मनुष्यों के छह माह (दक्षिणायण) के बराबर होती है।
क. देवयान बनाम पितृयान (वेदान्त और उपनिषद)
छान्दोग्य उपनिषद और भगवद गीता में दो मार्गों की चर्चा मिलती है— अर्र्चि मार्ग (देवयान) और धूम मार्ग (पितृयान)।
देवयान : जो आत्माएं उत्तरायण के प्रकाशमय समय में देह त्याग करती हैं, वे ब्रह्मलोक को प्राप्त होती हैं और उन्हें पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। यह मार्ग ज्ञान और चैतन्य का प्रतीक है।
पितृयान : दक्षिणायण के समय देह त्याग करने वाली आत्माएं पितृलोक को जाती हैं और अपने पुण्यों के क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक (पृथ्वी) पर लौट आती हैं।
ख़ . श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ: मोक्ष का मार्ग :
उत्तरायण के आध्यात्मिक महत्व को समझने के लिए भगवान श्रीकृष्ण का वह उपदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है जो उन्होंने अर्जुन को दिया था।
“अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥”
इसका अर्थ है कि जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन के उजाले में और शुक्ल पक्ष तथा उत्तरायण के छह महीनों में शरीर त्यागते हैं, वे ब्रह्म (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि उत्तरायण का मार्ग प्रकाश का मार्ग है, जो जीवात्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त करने में सहायक होता है।
ग. भीष्म पितामह का उदाहरण: इच्छा मृत्यु और प्रतीक्षा :
भीष्म पितामह का संकल्प (महाभारत)
महाभारत का प्रसंग उत्तरायण की महिमा का सबसे बड़ा उदाहरण है। कौरवों के सेनापति भीष्म पितामह को ‘इच्छा मृत्यु’ का वरदान प्राप्त था। शरशय्या पर लेटे होने के बावजूद, उन्होंने अपने प्राणों का त्याग तब तक नहीं किया जब तक कि सूर्य देव उत्तरायण नहीं हो गए। उन्होंने 58 दिनों तक प्रतीक्षा की क्योंकि वे जानते थे कि उत्तरायण में प्राण त्यागने से आत्मा को सद्गति प्राप्त होती है।उन्होंने दक्षिणायण में शरीर त्यागना उचित नहीं समझा। जैसे ही सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया और उत्तरायण का प्रारंभ हुआ, तब भीष्म ने अपनी आंखें खोलीं और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अपना नश्वर शरीर त्यागा। यह घटना उत्तरायण की आध्यात्मिक पवित्रता को सिद्ध करती है।
3 उत्तरायण के विभिन्न आयाम :
क) वैज्ञानिक एवं कृषि महत्व :
उत्तरायण के आगमन के साथ ही भारत में ‘वसन्त ऋतु’ की पदचाप सुनाई देने लगती है। ठंड कम होने लगती है और प्रकृति खिल उठती है। यह नई फसल के आने का समय होता है। किसान अपनी मेहनत का फल प्राप्त कर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
ख) स्वास्थ्य और आयुर्वेद का दृष्टिकोण :
आयुर्वेद के अनुसार, उत्तरायण ‘आदान काल’ है। इस समय सूर्य की किरणें अत्यंत प्रभावशाली होती हैं जो पृथ्वी से नमी को सोखती हैं। इस काल में शरीर की शक्ति को संचित करने के लिए तिल, गुड़ और खिचड़ी जैसे ऊर्जावर्धक खाद्यों का सेवन शास्त्रोक्त है।
ग) सांस्कृतिक विविधता :
उत्तरायण को पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है:
- गुजरात: यहाँ इसे ‘उत्तरायण’ ही कहा जाता है, जहाँ पतंगबाजी के माध्यम से सूर्य की किरणों का आनंद लिया जाता है।
- पंजाब और हरियाणा: ‘लोहड़ी’ के रूप में अग्नि देव की पूजा की जाती है।
- दक्षिण भारत: ‘पोंगल’ के रूप में सूर्य और पशुधन का आभार माना जाता है।
- असम: ‘भोगली बिहू’ के रूप में सामूहिक भोज आयोजित होते हैं।
4 अनुष्ठान और साधना :
उत्तरायण के प्रारंभ (मकर संक्रांति) पर कुछ विशेष अनुष्ठान शास्त्रों में वर्णित हैं:
क. पवित्र स्नान : गंगा, यमुना या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से संचित पापों का क्षय होता है। प्रयागराज में ‘माघ मेला’ इसी का एक विशाल रूप है।
ख. तर्पण : पूर्वजों को जल अर्पित करना ताकि उन्हें भी उत्तरायण की पवित्रता का लाभ मिले।
ग. दान की महिमा: इस काल में तिल, कंबल, अन्न और गाय के दान को ‘महादान’ माना गया है। तिल का उपयोग छह रूपों में करने का विधान है (तिल स्नान, तिल उबटन, तिल होम, तिल जल, तिल भक्षण और तिल दान) | संक्रांति का अर्थ है ‘परिवर्तन’। जब सूर्य एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाता है, तो उस संधि काल में की गई साधना और दान का फल अनंत गुना बढ़ जाता है। मकर संक्रांति के समय गंगा स्नान या पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व है। माना जाता है कि इस दिन जल में साक्षात् नारायण का वास होता है।
दान की परंपरा (गुप्त दान): इस दिन ‘तिल’ के दान का विशेष महत्व है क्योंकि तिल को शनि देव का प्रतीक माना जाता है और सूर्य (पिता) जब अपने पुत्र शनि (मकर राशि के स्वामी) के घर जाते हैं, तो तिल का प्रयोग संबंधों में मधुरता और दोषों के निवारण का प्रतीक बनता है।
खिचड़ी का भोग : उत्तर भारत में इसे ‘खिचड़ी पर्व’ भी कहते हैं। नए चावल और दाल का मिश्रण प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का एक तरीका है।
5 आध्यात्मिक संदेश : अंतस का उत्तरायण
केवल सूर्य का उत्तर की ओर मुड़ना पर्याप्त नहीं है, वास्तविक उत्तरायण तब होता है जब मनुष्य की चेतना ‘मूलाधार’ से उठकर ‘सहस्रार’ (ऊपर की ओर) गमन करती है।
दक्षिणायन: भोग, विलासिता और अंधकार की ओर झुकाव।
उत्तरायण: योग, संयम और आत्मज्ञान की ओर गमन।
यह पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य अपनी दिशा बदलकर प्रकाश फैलाता है, हमें भी अपने जीवन की दिशा बदलकर ज्ञान और परोपकार की ओर मुड़ना चाहिए।
6. जीवन के लिए आध्यात्मिक संदेश :
उत्तरायण केवल सूर्य की बाह्य गति नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के सूर्य (आत्मा) को जगाने का आह्वान है।
1. तमसो मा ज्योतिर्गमय : यह पर्व सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य उत्तर की ओर बढ़कर अंधकार मिटाता है, उसी प्रकार हमें भी अज्ञान के अंधेरे से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना चाहिए।
2. दृष्टिकोण का परिवर्तन : सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना यह दर्शाता है कि जीवन में बदलाव अपरिहार्य है। यदि हम सकारात्मक दिशा (उत्तर दिशा) चुनते हैं, तो हमारा उत्थान निश्चित है
3. तप और साधना : माघ मास और उत्तरायण का समय तपस्वियों के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस दौरान की गई एकाग्र साधना चित्त की शुद्धि करती है।
उत्तरायण केवल एक पंचांग की तिथि नहीं है, बल्कि यह एक ‘जीवन दर्शन’ है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में कठिन परिस्थितियों (सर्दियों/दक्षिणायन) के बाद हमेशा प्रकाश और समृद्धि (उत्तरायण) आती है। शास्त्रों की मानें तो यह समय आत्म-निरीक्षण और आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने का सबसे श्रेष्ठ अवसर है।
इस पावन काल में हमें अपनी जड़ों (शास्त्रों) से जुड़कर, सूर्य की भांति तेजस्वी और उदार बनने का संकल्प लेना चाहिए।अतः उत्तरायण या मकर संक्रांति भारत की सांस्कृतिक एकता का सूत्र है। दक्षिण में इसे ‘पोंगल’, पंजाब में ‘लोहड़ी’, असम में ‘बिहू’ और गुजरात में ‘उत्तरायण’ के नाम से मनाया जाता है। नाम भले अलग हों, लेकिन सबका मूल संदेश एक ही है— कृतज्ञता, दान और प्रकाश की ओर गमन। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि हम जड़ नहीं, बल्कि चैतन्य हैं। जिस प्रकार भीष्म ने प्रकाश की प्रतीक्षा की, हमें भी अपने भीतर के विकारों को त्यागकर सद्गुणों के ‘उत्तरायण’ में प्रवेश करना चाहिए। यह दिन केवल पतंग उड़ाने या तिल-गुड़ खाने का नहीं है, बल्कि अपने संकल्पों को ऊँचा उठाने और ईश्वर के समीप जाने का एक महा-अवसर है |